Sunday, November 15, 2009

phisalan
सब पूछ रहे हैं मुझ से की मैने अपने ब्लॉग का नाम फिसलन क्यूँ रखा है
सो मुझे लगा की साररी ज़िंदगी इंसान फिसलता और संभलता ही तो रहता है
कभी फिसलते केले के छिलके पर , तो कभी कीचड़ मैं,
कभी फिसलते भावनाओं में, तो कभी आकांक्षाओं में,
कभी फिसलते किसी की बातो से ,तो कभी मुलाक़ातो में,
कभी फिसलते अपने मूल्यों से, तो कभी अपने वादों से,
कभी फिसलते हैं गम में,तो कभी अपनी खुशियों में,
कभी फिसलते हैं पी कर,तो कभी बिना ही पिए,
कभी फिसलते हैं अपने शब्दों में, तो कभी अपने भावोंमें,
तो फिसलते हैं और संभालते हैं, ज़िंदगी भर युहीन ही,
सो रखा मैने अपने ब्लॉग का
नाम फिसलन ही..... . .

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